Sunday, April 25, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 22


आज छुट्‌टी का दिन था।
किन्तु राहुल को आज भी फुर्सत नहीं थी। आज सुबह से वह नये मकान की सफाई में लगा था। लगता था कि यह मकान बहुत दिनों से खाली पड़ा हो। जगह जगह मकड़ियों के जाले, चिड़ियों के घोंसले और हर वस्तु पूरी तरह धूल से अटी हुई थी।

दो कमरों की सफाई करने के बाद जब वह तीसरे कमरे में आया तो यहाँ का हुलिया कुछ दूसरे ही प्रकार का दिखाई दिया। जहाँ पहले दो कमरे गंदगी और धूल से अटे पड़े थे, वहीं यह कमरा पूरी तरह साफ सुथरा था। मानों कोई यहाँ रहता हो। इस कमरे में सामान के नाम पर केवल एक मेज थी। उसने मेज को हिलाने का प्रयत्न किया किन्तु वह अपने स्थान से टस से मस न हुई। उसने नीचे देखा तो उसे इसका कारण समझ में आ गया क्योंकि मेज के पाये भूमि में गड़े हुए थे।

‘कमाल है, पहले दो कमरे तो धूल मिट्‌टी में अटे पड़े थे फिर यह कमरा कैसे साफ है? लगता है जैसे यहाँ पर कोई रहता हो।’ उसने अपने मन में कहा। वैसे यह बात अक्ल में नहीं जँचती थी कि बाहर के दोनों कमरे वीरान रहते हों और अन्दर का कमरा आबाद रहे।
इस मकान में इस प्रकार कुल तीन कमरे थे इसके अलवा बाथरूम और किचन अलग से थे।

उसे तो केवल एक कमरे की आवश्यकता थी अत: उसने सबसे बाहरी कमरे में अपना डेरा जमा लिया।
सफाई इत्यादि करने में पूरा दिन बीत गया था और थकान भी महसूस हो रही थी अत: भोजन इत्यादि करने के पश्चात वह बिस्तर पर लेट गया और जल्द ही नींद ने उसे आ घेरा।

आधी रात का कोई समय रहा होगा जब उसकी आँख खुल गयी। किसी प्रकार की खटपट की अवाज थी जिसने उसे जगा दिया था। अन्दर के कमरों से कुछ आवाजें आ रही थीं।
‘क्या बात हो सकती है।’ मन ही मन कहता हुआ वह उठा और अन्दर जाने लगा। फिर उसने देखा कि सबसे भीतरी कमरे में रौशनी हो रही थी।

‘वाह!’ उसने अपने मन में कहा, ‘अभी उसे यहाँ आये हुए पहला ही दिन है कि चोरों ने भी धावा बोल दिया, किन्तु वे उस कमरे में क्या कर रहे हैं? उसमें तो कोई सामान भी नहीं है।’ वह दबे पाँव चलता हुआ कमरे के पास पहुंचा और दरवाजे की झिर्री से आँख लगा दी। किन्तु अन्दर के दृश्य ने उसे पछताने पर मजबूर कर दिया कि वह यहाँ क्यों आया। कमरे के बीचोंबीच रखी मेज गायब थी। उसके स्थान पर फर्श में एक बड़ा सा गड्‌ढा दिखाई दे रहा था। किन्तु जिस वस्तु ने उसके होश उड़ा दिये थे वह एक अस्थिपंजर था जो उस गड्‌ढे के ऊपर हवा में लटक रहा था।

फिर राहुल को यह भी होश नहीं रहा कि किस प्रकार वह वापस अपने बिस्तर पर आया और लेट कर इस प्रकार काँपने लगा मानो मलेरिया का ज्वर चढ़ आया हो। उसने अपने पास रखे घड़े से कई गिलास पानी निकाला और एक साँस में चढ़ा गया। 

1 comment:

Arvind Mishra said...

कहानी कितनी आगे बढ़ आयी देखते देखते ....निरंतरता और साहित्य साधना इसी को कहते हैं !