Sunday, April 18, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 18


जी-सुंदरम इस समय पुलिस कम्प्यूटर रूम की ओर जा रहा था। कुछ देर पहले उसकी फोन पर इं-त्यागी से बात हुई थी। उसने दोनो कंपनियों से हुई बातचीत उसे सुना दी थी और कहा था कि अभी वह कुछ समय और राजनगर में रुकेगा क्योंकि दोनों कंपनियों से बातचीत के बाद केस में एक नया मोड़ आ गया है। अत: वह वहाँं रुककर कुछ और बातें साफ करना चाहता है। हो सकता है इससे गृहमन्त्री की हत्या के सम्बन्ध् में कोई सुराग मिल जाये। 

‘ठीक है, तुम वहीं रुको।’ जी-सुंदरम ने उससे कहा था, ‘मैं कम्प्यूटर रूम से पता करता हूं कि उस सीडी के सम्बन्ध् में कोई बात पता चली या नहीं।’
जिस समय सुंदरम कम्प्यूटर रूम पहुंचा, वहाँ का इन्चार्ज बाहर ही टहल रहा था। सुंदरम को देखते ही उसने उसका अभिवादन किया।

‘‘क्या उस सीडी के बारे में पता चला कि उसमें कोई प्रोग्राम पहले लिखा गया था या नहीं?’’
‘‘सर, उस सीडी के बारे में हमें उससे कहीं अधिक सफलताएं मिल चुकी हैं।’’ इन्चार्ज ने प्रसन्नता के साथ कहा।
‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब ये कि न केवल हमने यह पता लगा लिया है कि उसपर पहले कोई प्रोग्राम लिखा गया था, बल्कि उस प्रोग्राम का नब्बे प्रतिशत हमने पुनरुत्पादित भी कर लिया है।’’
‘‘वेरी गुड। ये तो वास्तव में बहुत बड़ी सफलता है। क्या कुछ पता चला कि वह प्रोग्राम किस प्रकार का है?’’

‘‘वह प्रोग्राम कुछ अजीब प्रकार का है। आप स्वयं चलकर देख लीजिए।’’ इन्चार्ज उसे एक कम्प्यूटर के सामने ले गया। उसमें सीडी लगाकर कम्प्यूटर चला दिया। फिर स्क्रीन एक लिस्ट दर्शाने लगी। 
‘‘यह उस प्रोग्राम की डीकोडेड लिस्ट है। अभी मैंने उस प्रोग्राम को चलाया नहीं है । क्योंकि यह अधूरा है। इस प्रोग्राम का अध्ययन करके मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि यह विशेष प्रकार की तरंगें उत्पन्न करने का प्रोग्राम है।’’

‘‘तो इसका अर्थ हुआ कि मेरा दृष्टिकोण सही था। क्या आप इन तरंगों की फ्रीक्वेंसी बता सकते हैं?’’
‘‘सर, इसमें कई तरंगें एक साथ उत्पन्न करने का प्रोग्राम है और सभी की फ्रीक्वेसी अलग अलग है।’’
‘‘आप ऐसा करिये कि उन सभी तरंगों की फ्रीक्वेंसी लिखकर हमें दे दीजिए। मैं पता करूंगा कि ये किस प्रकार की तरंगें हैं।’’

इन्चार्ज उन तरंगों की फ्रीक्वेंसी लिखने लगा जबकि सुंदरम वहीं बैठकर केस के बारे में विचार करने लगा।
‘साफ्ट प्रो कंपनी का कहना है कि उसका प्रोग्राम वही था जो बी-सी-ओ- की सीडी पर है। जबकि यहाँ उसकी सीडी पर कुछ और ही निकला। इसका मतलब यह हुआ कि या तो वह कंपनी झूठ बोल रही है, या फिर उसकी सीडी बदलकर यह तरंगों वाली सीडी रख दी गयी। लेकिन फिर असली सीडी कहाँ गयी? क्या बीसीओ कंपनी के पास? जिसे उसने मीटिंग में अपने नाम से परिचित कराया। लेकिन अगर हम यह मान भी लें कि उसने यह सब किया है तो भी यह सवाल अपनी जगंह पर रह जाता है कि गृहमन्त्री की हत्या किस प्रकार हुई? क्या खोका का सम्बन्ध् बी-सी-ओ- से हो सकता है? मुझे इसके लिये यह देखना होगा कि खोका ने सरकार के सामने अपनी माँग क्या रखी थी? क्या वे माँगें ऐसी थीं जो बी-सी-ओ- कंपनी के हित में थीं? या वे कंपनी से असम्बद्ध थीं? लेकिन इन सबसे पहले मुझे यह देखना होगा कि यह तरंगें क्या काम कर सकती हैं। और यह जानना अब अनिवार्य हो गया है।’’ 

इन्चार्ज की आवाज ने उसके विचार भंग कर दिये, ‘‘तरंगों की फ्रीक्वेंसी मैंने लिख दी है सर। यह लीजिए।’’ उसने कागज सुंदरम की ओर बढ़ा दिया। जिसे सुंदरम ने अपनी जेब में रख लिया।
कुछ देर बाद उसकी कार नेहरू भौतिकी प्रयोगशाला की ओर जा रही थी। वहाँ का प्रोफेसर जी-एस-भार्गव सुंदरम का दोस्त था।
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1 comment:

PD said...

जरा जल्दी जल्दी लिखे भाई साहब, हम इन्तजार करते हैं दिन में दो पोस्ट का.. :)