Thursday, April 8, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 15


इस साउंडप्रूफ कमरे में केवल दो व्यक्ति बैठे हुए थे, जिसमें से एक के हुलिये के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता था। क्योंकि काले चश्मे तथा लम्बी कैप ने उसका चेहरा पूरी तरह छुपा लिया था। उसने एक ढीला ढाला ओवरकोट पहन रखा था।
दूसरा व्यक्ति भारी भरकम शरीर का मालिक था। घनी दाढ़ी तथा मूंछों ने उसके चेहरे को छुपा रखा था। हो सकता है यह दाढ़ी मूंछें नकली रही हों। इसके बारे में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता था।

‘‘तुम्हारा काम तो हो गया। अब यह बताओ कि हमारे काम का क्या रहा?’’ भारी भरकम शरीर वाले ने कहा।
‘‘खोका कभी अपने काम में ढिलाई नहीं बरतता।’’ काले चश्मे वाले व्यक्ति ने हाथ में पकड़ा छोटा सा बैग मेज पर रख दिया।
‘‘इसमें उन सभी शोधों के कागजों की कापियां हैं जो इण्डियन बायोटेक्नालाजी इन्स्टीट्‌यूट बाँस से प्लास्टिक उत्पादन पर कर रहा है।’’ 

भारी भरकम व्यक्ति बैग खोलकर उसमें रखे कागजात देखने लगा।
‘‘इसके बारे में हमारी लैबोरेट्री में ही पता लग सकेगा कि ये असली हैं या नकली।’’ उसने कहा।
‘‘यह कागजात पूरी तरंह असली हैं।’’ खोका संगठन के व्यक्ति ने कहा।

‘‘असली होना ही चाहिए। वरना तुम्हारा संगठन रह भी नहीं पायेगा।’’
‘‘यह तो समय ही बतायेगा। मैं अब चलता हूं। वह व्यक्ति दरवाजे की ओर बढ़ा। अभी वह दो तीन कदम बढ़ा होगा कि पीछे से आवाज आयी, ‘‘ठहरो।’’

उसने पीछे मुड़कर देखा। भारी भरकम व्यक्ति के हाथ में एक रिवाल्वर दिखाई पड़ रहा था।
‘‘क्या मतलब?’’ उसने कहा।
‘‘मैं तुम्हारा असली चेहरा देखना चाहता हूं। ताकि आगे से यदि हम कहीं मिलें तो मैं तुम्हें पहचान सकूं। तुम अपने चेहरे से काला चश्मा और कैप हटा दो।’’

‘‘क्या यह आज्ञा तुम्हारे बॉस की है?’’
‘‘तुम्हें इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए। तुम बिना अपना चेहरा दिखाये बाहर नहीं जा सकते।’’

‘‘यह आज्ञा तुम्हारे बॉस की नहीं बल्कि तुम्हारी है। मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि मेरा चेहरा देखने का अर्थ है तुम्हारी मौत। मैं तुम्हारे बारे में पूरी जानकारी रखता हूं, न केवल मैं बल्कि मेरा पूरा संगठन।’’
‘‘दूसरा व्यक्ति कुछ देर रिवाल्वर हाथ में लिये कुछ सोचता रहा फिर बोला, मैं यह कैसे मान लूं कि तुम सच कह रहे हो?’’

‘‘संकेत के लिए केवल इतना बता दूं कि राहुल को नये मकान में तुमने भेजा है। उसकी आड़ में धंधा करने के लिए।’’
दूसरा व्यक्ति कुछ देर सोचता रहा फिर रिवाल्वर नीचे झुकाते हुए बोला, ‘‘ठीक है। तुम जा सकते हो।’’

चश्मे वाला व्यक्ति बाहर निकल गया।

उसके जाने के बाद भारी भरकम व्यक्ति ने बैग उठाया और कमरे से बाहर आ गया। कुछ देर बाद उसकी कार सड़कों पर भाग रही थी। सड़कों के किनारे लगे साइन बोर्डों से पता लगता था कि यह राजनगर की सड़कें हैं
कार अपना रास्ता तय करती हुई लगभग आधे घंटे बाद राजनगर की सीमा पर पहुँच गयी। यहाँ से जंगल की शुरुआत होती थी। उसने कार को कच्चे रास्ते पर मोड़कर पेड़ों के एक झुण्ड के पास पहुंचा दिया। कार अब रुक चुकी थी।

कुछ देर तक वह व्यक्ति कार ही में बैठा रहा, फिर जब वह नीचे उतरा तो लम्बे चोगे के साथ तान्त्रिक के वेश में था। और अब वह जंगल में स्थित पुराने कब्रिस्तान की ओर जा रहा था।
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