Saturday, March 20, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 8


इस भयंकर दुर्घटना का पता बाहरी व्यक्तियों को तब लगा जब एक वेटर भोजन के बारे में पूछने के लिए उस कमरे में प्रविष्ट हुआ। कमरे का दृश्य देखकर एक पल को तो उसकी कुछ समझ में ही नहीं आया फिर जब उसने वहाँ उपस्थित सभी व्यक्तियों को मृत पाया जिनके नाक और कान से रक्त बहकर सूख गया था तो उसने एक चीख मारी। जल्द ही वहाँ पूरा होटल का स्टाफ एकत्र हो गया। सभी आश्चर्य व दु:ख से उस माहौल को देख रहे थे।
कमरे में गृहमन्त्री, उनके तीन सिक्योरिटी गार्ड, तीन कम्प्यूटर विशेषग्य तथा दोनों कम्पनियों के प्रतिनिधियों को मिलाकर कुल नौ लाशें पड़ी हुई थीं।

होटल के स्टाफ के एक व्यक्ति ने पुलिस को फोन किया। कुछ ही देर में पुलिस आ गयी। गृहमन्त्री की हत्या कोई मामूली बात नहीं थी अत: उच्चाधिकारियों को भी सूचित कर दिया गया। और फिर वहां सी-आई-डी, केन्द्रीय कमांडो फोर्स तथा कुछ अन्य सरकारी गुप्तचर संगठनों के प्रमुख अधिकारी एकत्रित हो गये।
गृहमन्त्री की मृत्यु की खबर पूरे देश में फैल गयी। लोगों ने शोक में दुकानें, दफ्तर बन्द कर दिये। सरकार ने तीन दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा कर दी।

नौ व्यक्तियों की सामूहिक मृत्यु के कारणों की खोज शुरू हो गयी थी। इस केस को तत्कालिक तौर पर इंस्पेक्टर त्यागराज उर्फ त्यागी को सौंप दिया गया। उसने लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था और सीडीज़ अपने कब्जे में लेकर कमरा सील कर दिया था।
इस समय वह पुलिस स्टेशन के एक कमरे में अपने सहायक सब इंस्पेक्टर मोहित कुमार के साथ बैठा हुआ था।
‘‘मामला बहुत जटिल है।’’ वह बोला, ‘‘नौ व्यक्तियों की अचानक मृत्यु जबकि न तो कहीं गोली का निशान, न अन्य किसी हथियार की संभावना। लगता है अचानक सभी को ब्रेन हैमरेज हो गया हो। क्या इसे हम हत्या का मामला कह सकते हैं?’’

‘‘सर, यदि यहाँ किसी प्राकृतिक मृत्यु का सवाल होता तो एक ही प्रकार की मृत्यु एक साथ नौ व्यक्तियों की कैसे आ गयी? यह कोई भूकम्प जैसी दुर्घटना भी नहीं है कि एक साथ हजारों व्यक्ति मलबे में जलकर मर जायें।’’ मोहित कुमार बोला।
‘‘लेकिन अगर यह सामूहिक हत्या का केस होता तो उसके चिन्ह् तो मिलने ही चाहिए थे। यहाँ तो कोई सिर पैर ही नहीं दिख रहा है।’’
‘‘हमने पूरा कमरा छान मारा लेकिन कहीं किसी भी प्रकार का कोई सुबूत नहीं मिला।’’

‘‘पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने दो। शायद उसी से कुछ सुराग मिल सके। कम से कम यह तो मालूम हो जायेगा कि उनकी मृत्यु का असली कारण क्या था।’’
‘‘और सर कम्प्यूटर के पास रखी हुई वे सीडीज़ किस प्रकार की थीं?’’
‘‘उनके बारे में मुझे पता चला है कि वे दो कंपनियों की ओर से भेजी गयी थीं। उनमें कुछ विशेष प्रोग्राम थे जिन्हें उन कंपनियों के प्रतिनिधि गृहमन्त्री को दिखाने आये थे। उन प्रोग्रामों के आधार पर गृहमन्त्री यह फैसला करते कि किस कंपनी को भारत में स्थायी व्यापार की अनुमति दी जाये। मैंने उन सीडीज को भी निरीक्षण के लिए भेज दिया है। यह देखने के लिए कि उनमें किस प्रकार के प्रोग्राम थे।’’

‘‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कि गृहमन्त्री ने एक कंपनी के बारे में फैसला दे दिया हो । निराश होकर दूसरी कंपनी ने उनकी हत्या कर दी हो?’’
‘‘ऐसा नहीं हो सकता। यह मत भूलो कि मरने वाले नौ व्यक्तियों में दोनों कंपनियों के प्रतिनिधि थे। भला कोई कंपनी अपने ही प्रतिनिधि की हत्या क्यों करने लगी?’’
‘‘तो हमें तब तक हाथ पर हाथ धरे बैठना पड़ेगा जब तक पोस्टमार्टम की रिपोर्ट नहीं आ जाती है।’’

‘‘हाँ। हमें पोस्टमार्टम की रिपोर्ट की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। तब तक मेरा विचार है कि उस कमरे का एक बार और निरीक्षण कर लिया जाये।’’ इंस्पेक्टर त्यागी ने कहा और दोनों कुर्सी से उठ गये।
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