Thursday, March 18, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 7


‘‘एक कारण हो सकता है दोनों के प्रोग्राम समान होने का’’ एक कम्प्यूटर विशेषज्ञ बोला। 
‘‘वह क्या?’’ दोनों ने एक साथ पूछा।
‘‘तकनीक की चोरी। यानि इनमें से किसी एक कंपनी ने दूसरे की तकनीक चुरायी है।’’

‘‘मेरी कंपनी तो ऐसा कदापि नहीं कर सकती। वह विश्व की जानी मानी बहुराष्ट्रीय कंपनी है। उसे यह सब करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसके पास स्वयं एक से बढ़कर एक प्रतिभाएं हैं।’’ सुधीर कुमार ने कहा।
‘‘मेरी कंपनी भी ऐसा नहीं कर सकती। वह जापान की जानी मानी कंपनी है। और विश्व के एक तिहाई से भी अधिक देशों से उसका व्यापार चलता है।’’ मनोज वर्मा ने भी अपनी कंपनी की ओर से सफाई दी।

‘‘ठीक है।’’ गृहमन्त्री ने हाथ उठाकर दोनों को रोका,‘‘अभी दोनों साफ्टवेयर टेस्ट किये जायेंगे। हो सकता है दोनों में कुछ अन्तर हो। इस दशा में जो प्रोग्राम श्रेष्ठ होगा, वही स्वीकार किया जायेगा।’’
‘‘हम इसके लए तैयार हैं।’’ दोनों ने एक स्वर में कहा, ‘‘तो हम लोग प्रोग्रामों के परीक्षण के लिए तैयारी करते हैं।’’ विशेषगयों ने कहा। 

जी हाँ आप लोग अपनी तैयारियां कीजिए।’’ गृहमन्त्री ने आज्ञा दे दी और वे लोग उठ गये। विशेषज्ञ परीक्षण की तैयारियां करने लगे। जबकि गृहमन्त्री तथा दोनों कंपनियों के प्रतिनिधि जलपान करने में लग गये थे।
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लगभग एक घंटे के बाद वे लोग कम्प्यूटर रूम में मौजूद थे। सुधीर कुमार को सबसे पहले मौका दिया गया अपना साफ्टवेयर दिखाने के लिए। सुधीर कुमार ने अपनी पैकेट खोला और उसमें रखी सी-डी- कम्प्यूटर में लगा दी। थोड़ी देर तक साफ्टवेयर इंस्टाल होता रहा। फिर सुधीर कुमार बताने लगा, ‘‘एक संदिग्ध, जो अभी ए-टी-एस- ने दिल्ली में पकड़ा है। मैं उसकी कुछ डीटेल इसमें डालता हूं।’’
उसने कम्प्यूटर में कुछ आँकड़े डाले और थोड़ी ही देर में स्क्रीन पर एक लम्बी लिस्ट प्रदर्शित हो गयी। 

‘‘इस लिस्ट में जो नाम आपको लाल रंग में दिखाई दे रहे हैं वह सबसे ज्यादा संदिग्ध हैं। जबकि नीले रंग वाले स्लीपिंग ग्रुप में रखे जा सकते हैं। हरे रंग वाले वह हैं जो इससे जुड़े तो हैं लेकिन शक के दायरे से बाहर हैं। अब आप इनमें से कोई भी नाम चुन कर उसकी पूरी डीटेल देख सकते हैं।’’

गृहमन्त्री ने विशेषज्ञों की तरफ इशारा किया। उन्होंने थोड़ी देर साफ्टवेयर को चेक किया और फिर सहमति में सर हिलाया।
‘‘ठीक है आपका प्रोग्राम काफी अच्छा है। अब मैं साफ्ट प्रो कंपनी का भी साफ्टवेयर देखना चाहूंगा।’’ गृहमन्त्री ने कहा।
सुधीर कुमार ने अपनी सी-डी- कम्प्यूटर से निकाल ली थी।

मनोज वर्मा ने कम्प्यूटर में अपनी सी-डी- लगाई। और उसमें प्रोग्राम सेट होने की प्रतीक्षा करने लगा।
दस सेकंड--बीस सेकंड-- --घड़ी की सूईयों ने एक मिनट पूरा किया किन्तु कम्प्यूटर की स्क्रीन पहले की तरंह सादी रही। मनोज वर्मा के मस्तक पर चिन्ता की लकीरें उत्पन्न होने लगी थीं। बाकी लोग उत्सुकता से साफ्टवेयर के सेट होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
आधा मिनट और बीता।

‘‘इसमें इतनी देर क्यों लग रही है?’’ गृहमन्त्री भी व्याकुल हो उठे थे।
‘‘इतनी देर तो नहीं लगनी चाहिए। शायद सी-डी- कुछ गड़बड़ हो गयी है।’’ मनोज वर्मा ने सी-डी- निकालने के लिए हाथ बढ़ाया। अचानक कम्प्यूटर से विशेष प्रकार की भनभनाती आवाज़ आने लगी।

इसी के साथ कुछ चीखें उत्पन्न हुईं। इन चीखों में तड़ाक की हल्की आवाजें दब गयीं जो इस प्रकार की थीं मानो शरीर की कई नसें एक साथ फटी हों। फिर वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को यह सोचने का मौका नहीं मिल सका कि किस प्रकार मौत के पंजों ने उन्हें जकड़ लिया था। और वे बेजान होकर अपने अपने स्थान पर गिर गये। वहाँ के वातावरण पर दिल हिला देने वाला सन्नाटा छा गया था।
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3 comments:

divy karni rajpurohit said...

nice blog with lots of knowledge.

Arvind Mishra said...

अरे यह क्या हो गया भाई ?

Swapnil Bhartiya said...

Instant Death se kaafi milti julti hai ;-)