Friday, March 12, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 5


‘‘आज आपका पहला काम यह है कि इस पैकेट को साफ्ट प्रो कंपनी को पहुंचाना है। मैं उसका पता समझा देता हूं।’’ मि0 भटनागर ने राहुल को पैकेट की ओर संकेत किया जो सामने मेज पर रखा हुआ था। उसका साइज उतना ही था जितना एक मोटे उपन्यास का होता है।
फिर वह विस्तार से राहुल को साफ्ट प्रो का पता समझाने लगा। फिर राहुल उस पैकेट को लेकर बाहर आ गया।  साफ्ट प्रो कंपनी जिस स्थान पर थी वहाँ जाने के लिए बस भी चलती थी और टैक्सियां भीं। राहुल ने बस से जाने का निश्चय किया। वह बस स्टाप की ओर बढ़ने लगा। अभी वह थोड़ी ही दूर चला था कि एक व्यक्ति से टकरा गया जो बहुत जल्दी में दौड़ता हुआ आ रहा था। इस टक्कर में उसके हाथ से पैकेट छूटकर गिर गया और वह स्वयं भी लड़खड़ा गया। जबकि वह व्यक्ति पूरी तरंह भूमि पर लुढ़क गया।

‘‘क्या हुआ?’’ कई राहगीर ठिठक गये।
‘‘कोई बात नहीं । गलती मेरी ही थी। मैं ही इनसे टकरा गया था।’’ उस व्यक्ति ने उठते हुए कहा। साथ ही उसने पैकेट उठाकर राहुल के हाथ में पकड़ा दिया।

रुकने वाले लोग अपने रास्ते फिर चल दिये और साथ ही वह व्यक्ति भी। लेकिन उनमें से एक व्यक्ति ऐसा था जो अब भी वहीं खड़ा था। और यह था ट्रैफिक कांस्टेबल रामसिंह जो टोपी उतारकर अपना सर खुजला रहा था और बड़बड़ा रहा था, ‘‘कमाल है। इस स्थान पर आज यह तीसरी टक्कर है।’’

कुछ देर बाद राहुल साफ्ट प्रो कंपनी की इमारत में प्रविष्ट हो रहा था। अन्दर प्रवेश करने के बाद उसने एक व्यक्ति से ब्रांच मैनेजर के कमरे के बारे में पूछा और कुछ ही पलों बाद वह ब्रांच मैनेजर के सामने खड़ा था।
ब्रांच मैनेजर सिंग ली एक ठिगने कद का जापानी था। यहाँ आने के बाद राहुल को पता चला कि साफ्ट प्रो कंपनी भी जापानी थी।
‘‘मैं गिरधारीलाल एण्ड कंपनी की ओर से आया हूं।’’

‘‘ओह! तो आप वह माल लेकर आये हैं जिसका मैंने आर्डर दिया था।’’ सिंगली ने राहुल के हाथ में पैकेट देखकर कहा। राहुल को आश्चर्य हुआ क्यांकि सिंगली शुद्ध हिन्दी बोल रहा था।
सिंगली ने राहुल के हाथ से पैकेट लेकर एक व्यक्ति को दे दिया और बोला, ‘‘इसे चेक करो कि इसमें मौजूद सी-डी- सही हैं या नहीं।’’ फिर राहुल से बोला, ‘‘आप कुछ देर यहाँ रुकिये।’’

कुछ देर बाद वह व्यक्ति वापस आया और बोला, ‘‘बॉस, वह सी-डी- सही काम कर रही हैं और उनपर मौजूद साफ्टवेयर भी सही काम कर रहे हैं।’’
‘‘ठीक है। अब आप जा सकते हैं।’’ सिंगली ने राहुल से हाथ मिलाते हुए कहा और राहुल कुर्सी से उठ गया।
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अम्बेडकर रोड पर स्थित यह बहुमंजिला इमारत राजनगर की प्रमुख मार्केटों में से एक थी । इस इमारत में अनेक कम्पनियों के आफिस भी थे।
इसी इमारत के एक कमरे में बहुराष्ट्रीय कम्पनी बी-सी-ओ- की स्थानीय शाखा का अफिस था जहाँ राहुल से टकराने वाला वह व्यक्ति बैठा हुआ था।

‘‘क्या काम हो गया?’’ उसके सामने बैठे व्यक्ति ने पूछा।
‘‘जी हाँ मि0 शोरी । मैं सामान भी ले आया हूं।’’ कहते हुए उस व्यक्ति ने एक पैकेट मि०शोरी के सामने रख दिया जो हूबहू राहुल के पैकेट जैसा था।

‘‘गुड। क्या यह असली है?’’
‘‘मेरा काम कभी गलत नहीं होता। उस टक्कर को देखने वाले वहाँ काफी लोग थे। एक कांस्टेबल समेत।’’
‘‘फिर तो समझो काम बन गया। अब मुझे परसों गृहमन्त्री के साथ होने वाली मीटिंग की प्रतीक्षा है। जिसमें वे हमारे भारत में स्थायी प्रवेश की घोषणा करेंगे।’’ शोरी ने सिगार सुलगाते हुए कहा।

‘‘उस मीटिंग में हमारा प्रतिनिधी कौन होगा?’’
‘‘सुधीर कुमार। यानि हमारा असिस्टेंट मैनेजर। वह कल की फ्लाइट से दिल्ली जा रहा है।’’
‘‘क्या उसे वहाँ भेजना ठीक रहेगा? क्योंकि मेरा विचार है कि वह इतना कुशल नहीं कि अपनी बात ठीक से मीटिंग में रख सके।’’
‘‘वह उस मीटिंग के लिए पूरी तरंह सही है। यह न केवल मेरा बल्कि उच्चाधिकारियों का भी विचार है।’’
‘‘उस मीटिंग में हमारी विरोधी कंपनी यानि साफ्ट प्रो की ओर से कौन शामिल हो रहा है?’’

‘‘अभी इस बारे में कुछ पता नहीं चला है। वैसे मेरा अनुमान है कि वे भी वहाँ के लिए कोइ स्थानीय व्यक्ति ही भेजेंगे।’’
‘‘अगर साफ्ट प्रो कंपनी ने सरकार को अपने विश्वास में ले लिया तो हमारा पत्ता तो साफ हो जायेगा।’’
‘‘ऐसा नहीं होगा।’’ शोरी ने कहा, ‘‘हमारा पूरा प्रयास है कि हमीं लोग सफल हों। मुझे पूरा विश्वास है कि सरकार कम्प्यूटर के क्षेत्र में व्यापार करने की अनुमति हमारी ही कंपनी को देगी।’’
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