Wednesday, March 10, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 4


अगले दिन राहुल गिरधारीलाल के आफिस में मौजूद था। गिरधारीलाल रामदयाल का कारोबारी दोस्त था और रामदयाल ने फोन पर उससे बात करने के पश्चात राहुल को वहां भेजा था।
‘‘मि0 राहुल। जाईये आपको बॉस बुला रहे हैं।’’ थोड़ी देर बाद सेक्रेटरी ने राहुल को संबोधित किया और राहुल ने बॉस के चैंबर में जाने के लिए अपने कदम बढ़ाये।

जब वह अन्दर दाखिल हुआ तो सामने ही कुर्सी पर गिरधारीलाल बैठा हुआ था जो शरीर से पैंतीस चालीस की आयु का मालूम हो रहा था। उसने सुनहरे फ्रेम का चश्मा लगा रखा था और नर्म चेहरे का मालिक था। उसने राहुल को बगल की कुर्सी पर बैठने का संकेत किया।
‘‘तो आप नौकरी की तलाश में यहाँ आये हैं।’’ कुछ देर राहुल को देखने के पश्चात गिरधारीलाल ने पूछा।
‘‘जी हाँ। मैंने अपने गाँव के पास एक कस्बे से बी-ए- किया है और नौकरी की तलाश में यहां आ गया। मुझे मेरे दोस्त रामदयाल ने बताया है कि आपके यहां जगंह खाली है।’’

‘‘मि0 रामदयाल ने कुछ देर पहले मुझे फोन किया था। मैं आपको फिलहाल डिस्ट्रीब्यूटर बना रहा हूं। आपका काम होगा हमारे विभिन्न कस्टमर्स को माल की सप्लाई पहुंचाना और विभिन्न कम्पनियों से हमारी माँग के अनुसार सामान ले आना। आपको मैं मि0 भटनागर के अंडर में दे रहा हूं। वे आपको विस्तार से काम समझा देंगे। आपका वेतन फिलहाल तीन हज़ार है जो बाद में बढ़ा दिया जायेगा।’’ गिरधारीलाल ने घंटी पर हाथ रखते हुए कहा।

‘‘आपका बहुत बहुत ध्न्यावाद। मैं आपका बहुत आभारी हूं।’’ राहुल ने प्रसन्नतापूर्वक कहा।

सेक्रेटरी अन्दर दाखिल हुआ। गिरधारीलाल ने उससे कहा, ‘‘इन्हें मि0 भटनागर से मिलवा देना और कह देना कि मैंने इनको डिस्ट्रीब्यूटर के तौर पर रख लिया है। वे इन्हें काम समझा देंगे।’’
‘‘आईये मेरे साथ।’’ सेक्रेटरी ने राहुल से कहा और राहुल कुर्सी से उठ गया।
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‘‘यार मुझे नौकरी तो मिल गयी। और इसके लिए मैं तुम्हारा सदैव आभारी रहूंगा।’’ राहुल ने रामदयाल से कहा। उसके चेहरे से गहरी प्रसन्नता छलक रही थी।
‘‘क्यों? मैंने क्या किया?’’

‘‘अरे यार तुम्ही ने तो गिरधारीलाल से मेरी सिफारिश की थी।’’
‘‘अरे छोड़ो इन सब बातों को। एक दोस्त को दोस्त के इतना काम तो आना ही चाहिए। वैसे उन्होंने तुम्हें काम क्या दिया है? और वेतन कितना है?’’
राहुल ने काम और वेतन बताया।

‘‘ठीक है। शुरुआत में इतना वेतन तो होता ही है। फिर धीरे धीरे तरक्की करते जाओगे। तो तुम अपने काम की शुरुआत कब से कर रहे हो?’’
‘‘कल ही से। बास ने मुझे कल सुबह आठ बजे बुलाया है।’’

‘‘ठीक है। अच्छा अब तुम आराम करो। मैं एक काम के सिलसिले में बाहर जा रहा हूं। ’’ रामदयाल ने उठते हुए कहा।
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2 comments:

Arvind Mishra said...

मंथर गति ....

seema gupta said...

आज ही पढ़ा , रोचक .....

regards