Monday, March 8, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 3


राहुल उसे देखकर कुर्सी से उठ गया। दोनों एक दूसरे को कुछ देर इस प्रकार देखते रहे मानो पहचानने का प्रयत्न कर रहे हों। फिर आने वाले व्यक्ति जो वास्तव में रामदयाल ही था बोला, ‘‘अरे यह तू है राहुल। तू तो एकदम बदल गया है।’’
‘‘तुम भी तो एकदम बदल गये हो। लग ही नहीं रहा है कि यह मेरा वही बचपन का मित्र है जिसके साथ मैं खेला करता था।’’ राहुल ने रामदयाल के गले लगते हुए कहा।

‘‘हम लोगों को एक दूसरे से अलग हुए भी तो काफी समय बीत गया है। इतने समय में तो एक पीढ़ी बूढ़ी हो जाती है और दूसरी जवान।’’ रामदयाल ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, ‘‘खैर छोड़ो यह सब। यह बताओ कि यहाँ कैसे आना हुआ? लेकिन यह बाद में बताना। पहले मैं तुम्हारे खाने पीने का इंतिज़ाम करता हूं।’’ कहते हुए वह उठकर अन्दर गया। फिर कुछ देर बाद वापस लौट आया, ‘‘हाँ अब बताओ क्या बात है?’’

‘‘बात तो वही पुरानी है। यानि नौकरी। मैं नौकरी की तलाश में यहाँ आया हूं। यार तुम तो यहीं रहते हो। तुम्हें तो पता ही होगा कि अच्छी नौकरी कहाँ कहाँ मिल सकती है।’’ राहुल ने कहा।
‘‘नौकरी के लिए तो मुझे देखना पड़ेगा। वैसे अखबारों में तो रोज़ ही कुछ न कुछ निकलता रहता है, लेकिन उसमें काम की बहुत कम होती हैं। मैं देखूंगा। फिलहाल तुम खाना खाकर आराम करो।’’ रामदयाल ने कहा। अब तक भोजन आ चुका था। राहुल ने खाना शुरू कर दिया।

‘‘यार, तुम्हारा मकान तो काफी खूबसूरत है। लगता है तुमने यहाँ काफी पैसा कमा लिया है क्या कोई बिजनेस किया है?’’
‘‘तुमने ठीक समझा। मैंने कम्प्यूटर का बिजनेस जमा लिया है। यानि मैं कम्प्यूटर और उसके उपकरण और साथ में साफ्टवेयर भी बेचता हूं।’’

‘‘कम्प्यूटर से तो तुम्हें बचपन में ही बहुत प्रेम था। और तुम कहीं भी कम्प्यूटर की कोई किताब मिल जाती थी तो उसे चाट डालते थे।’’
‘‘इसीलिए मुझे यहाँ इस क्षेत्र में पांव जमाने में काफी आसानी हुई। शुरू में जब मैं यहां आया था तो मुझे कम्प्यूटर के बारे में जानकारी होने के कारण एक छोटी सी कंपनी में कम्प्यूटर आपरेटर की नौकरी मिल गयी। धीरे धीरे मेरी तरक्की होती गयी और इसके साथ ही मैंने अपनी एक अलग छोटी सी कंपनी खोल ली। काम करते करते मुझे काफी तजुर्बा हो गया था इसलिए जल्दी ही मेरी कंपनी चल निकली। और अब हालत यह है कि जिस कंपनी में पहले मैं काम करता था, अब उसी से कारोबार करता हूं।’’ रामदयाल ने अपनी कहानी बतायी।

‘‘तुम वास्तव में बहुत भाग्यशाली रहे। ये बताओ कि तुमने शादी वादी भी की है या यूं ही हो अब तक?’’
‘‘फुर्सत ही नहीं मिली इन सब बातों के बारे में सोचने की। अब सोचता हूं कि शादी कर लूं। अच्छा अब तुम आराम करो। कल तक मैं तुम्हें देखकर बता दूंगा कि कहाँ कहाँ नौकरी की जुगाड़ हो सकती है।’’ रामदयाल ने राहुल से कहा जो खाना खाकर बेड पर लेट चुका था और थके होने के कारण उसकी आँखें बन्द हो रही थीं।
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