Friday, March 5, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 2


राजनगर के पूर्वी बस स्टाप पर अभी अभी एक बस आकर रुकी थी। उसकी दशा देखकर अनुमान होता था कि वह किसी दूर दराज के इलाके से आ रही है। बस का इंजन बन्द हुआ और यात्रियों ने उतरना आरम्भ कर दिया। इन यात्रियों में राहुल नाम का एक युवक भी था। वह उन युवकों में से था जो अक्सर कुछ पढ़ लिखकर नौकरी की तलाश में गाँव से शहर आ जाते हैं। उसने भी करीबी कस्बे के एक कालेज से बी-ए- किया था और अब नौकरी की तलाश में यहां खड़ा था। हाथ पैरों से वह किसी भी अन्य गाँववासी की तरंह मजबूत था, रंग कुछ ढकता हुआ था। उसने नीले रंग की पतलून तथा धारीदार शर्ट पहन रखी थी। सामान के नाम पर उसके हाथ में एक बैग था।
उसने सवारी की तलाश में इधर उधर नज़रें दौड़ायीं। इस शहर में जान पहचान के नाम पर केवल एक बचपन का मित्र था जो उससे दस साल बड़ा था और जब वह स्वयं दस साल का था तो उसी समय वह मित्र भाग कर शहर चला आया था। बाद में उसने पत्र द्वारा राहुल को बताया था कि अब वह शहर में बड़े आराम से है और साथ ही साथ शहर आने की दावत भी दे दी थी।

जल्द ही राहुल को एक सवारी मिल गयी। यह एक रिक्शा था।
‘‘केदारनाथ रोड चलो।’’ उसने आदेश दिया और रिक्शे पर बैठ गया।

रिक्शा अपने रास्ते पर चलने लगा। राहुल आश्चर्य से अपने चारों ओर की चहल पहल को देख रहा था जो उसके गाँव की शान्ति की तुलना में इतनी अधिक लग रही थी मानो हर व्यक्ति किसी आपदा से डर कर भाग रहा हो। उसने अपने जीवन में कभी इतना चकाचौंध भरा जीवन नहीं देखा था। एक कस्बे से वह अवश्य परिचित था किन्तु वहाँ भी छोटी मोटी दुकानों से अधिक कुछ नहीं था।

‘‘बाबूजी, केदारनाथ रोड आ गया। किध्रा चलना है?’’ रिक्शे वाले की आवाज़ ने उसकी तन्द्रा भंग कर दी और वह चौंक पड़ा।
‘‘ओह हाँ। यहीं रिक्शा रोक दो।’’ उसने इधर उधर नज़रें दौड़ाते हुए कहा। रिक्शा रुक गया। उसने नीचे उतरकर किराया दिया और बगल की इमारतें देखते हुए आगे बढ़ने लगा।

‘‘क्यों भाई साहब, यहाँ सुनार की गली कौन सी है?’’ उसने एक व्यक्ति को रोककर पूछा।
‘‘उसी के सामने तो आप खड़े हैं।’’ उस व्यक्ति ने उत्तर दिया। राहुल ने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ एक गली मौजूद थी। वह उस गली में मुड़ गया। आगे बढ़ते हुए वह मकान के नम्बर पढ़ता जा रहा था। फिर वह एक आलीशान इमारत के सामने जाकर रुक गया। उसने आश्चर्य से इमारत को देखा फिर अपनी जेब से एक छोटी सी नोटबुक निकाली और उसपर लिखे नम्बर से इमारत का नंबर मिलाने लगा। दोनों नम्बर समान थे।

‘‘कमाल है। रामदयाल ने इतना बड़ा मकान कैसे बनवा लिया। इसका मतलब हुआ कि उसके पास काफी पैसा आ गया है।’’ उसने कालबेल पर उंगली रखी। दूर कहीं घंटी बजने की आवाज़ आयी। थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला जो हुलिये से कोई नौकर मालूम होता था। उसने प्रश्नात्मक दृष्टि से राहुल की ओर देखा।

क्या मि0 रामदयाल का मकान यही है?’’ राहुल ने पूछा। उसने स्वीकृति में सर हिला दिया।
‘‘उनसे कह दो कि राहुल गाँव से उनसे मिलने आया है।’’
‘‘ठीक है। आप ड्राइंगरूम में बैठ जायें।’’ नौकर ने कहा और ड्राइंग रूम का दरवाजा खोल दिया। राहुल वहाँ बैठ गया और नौकर अन्दर चला गया।

ड्राइंग रूम की सजावट काफी शानदार थी। दीवारों पर कुछ कलाकारों की पेंटिंग्स लगी हुई थीं जिससे लगता था कि इस घर का मालिक आर्ट का शौक़ीन है। अभी राहुल को वहाँ बैठे थोड़ी ही देर हुई थी कि अन्दर से कुर्ता पाजामा पहने एक व्यक्ति ने प्रवेश किया। यह व्यक्ति गोल चेहरे और दोहरे बदन का मालिक था। 

1 comment:

Arvind Mishra said...

वातावरण सृजित हो रहा है !