Wednesday, March 3, 2010

मौत की तरंगें : एपिसोड - 1


पेड़ों से टकराकर हवाओं की गूँजती हुई सीटी की आवाज़ आधी रात के सन्नाटे को भंग कर रही थी। अन्यथा पूरी तरंह सुनसान इस छोटे मोटे जंगल की पगडंडी पर वह व्यक्ति अकेला अपने पग बढ़ा रहा था। कंधे पर झोला लटकाये वह व्यक्ति अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी और लंबे बालों के कारण इस सुनसान स्थान पर किसी तिलिस्मी कहानी के प्रेत से कम नहीं प्रतीत हो रहा था। वैसे वह जिस ओर बढ़ रहा था, उसके लम्बे चोगे को देखकर कोई भी व्यक्ति उसे तान्त्रिक कह सकता था।

पगडंडी समाप्त हुई। सामने ही एक पुराना कब्रिस्तान दिखाई पड़ रहा था। वह व्यक्ति उसमें प्रविष्ट हो गया। चाँद की रौशनी में अनेक पुरानी टूटी फूटी कब्रें चमक रही थीं। लगभग चार पाँच कब्रें पार करने के बाद वह एक टूटी कब्र के सामने जाकर ठहर गया। उसने अपना थैला नीचे रखा और उसमें से समान निकाल निकालकर एक ओर रखने लगा। इस सामान से उसने विशेष प्रकार की छोटी लकड़ियां अलग कीं और उन्हें सुलगाने लगा। जल्द ही उन लकड़ियों ने आग पकड़ ली और वहां पर विशेष प्रकार की नीली आग की लपटें निकलने लगीं। उसने अपने हाथ में पकड़ी किसी जानवर की हड्‌डी से लोहे के तवे पर दो तीन बार चोट की और कुछ बड़बड़ाने लगा। 

फिर थोड़ी देर बाद वहाँ एक भयानक दृश्य दिखाई दिया जो किसी भी व्यक्ति के रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी था। थोड़ी दूर पर स्थित पेड़ों के झुरमुट में से एक अस्थिपंजर निकला और तान्त्रिक की ओर बढ़ने लगा। उस कंकाल की हड्डियां चाँद की रौशनी में चमक रही थीं। तान्त्रिक उसे देखकर चुप हो गया। फिर जब वह कंकाल उसके पास आ गया तो उसने फिर बोलना शुरू कर दिया। वह कोई अजीब भाषा बोल रहा था या शायद मन्त्रों का उच्चारण कर रहा था। फिर कुछ देर बाद जब वह मौन हो गया तो कंकाल ने बोलना आरम्भ कर दिया। उसकी आवाज़ विशेष प्रकार की खरखराती हुई थी।

कुछ देर वह बोलता रहा फिर वापस मुड़ गया और चलता हुआ पेड़ों के झुरमुट में गायब हो गया। तान्त्रिक उसे जाता हुआ देखता रहा। जब वह कंकाल गायब हो गया तो उसने भी अपना सामान समेटना शुरू कर दिया। उसने सामान थैले में रखा और उसे कंधे पर रखकर दोबारा उसी दिशा में चलने लगा जिधर से आया था। उसके द्वारा जलायी गयी आग अब धीमी हो गयी थी।
कुछ देर में वह जंगल पार करके पेड़ों की अंतिम पंक्ति के निकट पहुंच गया था। इस पंक्ति के बाद पक्की सड़क थी। यहां पर एक कार खड़ी थी। उसने कार का दरवाज़ा खोला और अंदर  प्रविष्ट हो गया। कुछ देर तक अंदर ही वह अपना हुलिया बदलता रहा फिर जब ड्राईविंग सीट पर आकर उसने कार स्टार्ट की तो उसका हुलिया बिल्कुल बदल गया था। चेहरे की दाढ़ी गायब हो चुकी थी और आँखों पर काला चश्मा चढ़ गया था।

 कार कुछ देर चलने के बाद एक शहर की सीमा में दाखिल हो गयी। नाम दर्शाने वाला पत्थर इस शहर का नाम राजनगर दर्शा रहा था।
--------continued

2 comments:

Kaviraaj said...

बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।

आपका लेख अच्छा लगा।

हिंदी को आप जैसे ब्लागरों की ही जरूरत है ।


अगर आप हिंदी साहित्य की दुर्लभ पुस्तकें जैसे उपन्यास, कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, निबंध इत्यादि डाउनलोड करना चाहते है तो कृपया किताबघर पर पधारें । इसका पता है :

http://Kitabghar.tk

Arvind Mishra said...

वाह यह शुरू हुयी कोई झन्नाटेदार एस ऍफ़